My life
did not begin
at the beginning,
nor will
my death
come at its end.
They will not
follow each other
though their paths
may often cross.
In a single life
I get born
and reborn
every now and then,
just as I die
over and over again;
just as I live
on and on.
* * *
4 July 2010
Friday, August 6, 2010
Fear and Trust
I fear -
and yet I tread
a path that
beckons me from the beyond.
There are no landmarks
that I recognize,
no skyline that is familiar,
no patterns that I see,
no memory I can resort to,
no advice I can lean on.
Fear is human,
as is doubt;
but the lure of the unknown
is also strong,
for life cannot be
simply gathering moss.
I take a step,
in trust,
that what brought me
to this crossroads,
will remain by my side
on paths to come as well.
* * *
4 July 2010
and yet I tread
a path that
beckons me from the beyond.
There are no landmarks
that I recognize,
no skyline that is familiar,
no patterns that I see,
no memory I can resort to,
no advice I can lean on.
Fear is human,
as is doubt;
but the lure of the unknown
is also strong,
for life cannot be
simply gathering moss.
I take a step,
in trust,
that what brought me
to this crossroads,
will remain by my side
on paths to come as well.
* * *
4 July 2010
Friday, June 18, 2010
विदेश से लौटने पर
भीड़ है,
शोर है
और धूल-
जो वहां नहीं हैं।
शाल है,
कोट है
और गुनगुनी धुप -
जो वहां नहीं हैं।
सड़क किनारे बंधी भैंस,
गोबर के कंडे
और पेशाब के धब्बे -
जो वहां नहीं हैं।
समोसे हैं,
छोले
और गोल-गप्पे -
जो वहां नहीं हैं।
खटारा सड़क,
खटारा बस
और बेतरतीब ट्राफ्फिक-
जो वहां नहीं हैं।
जो वहां नहीं है, नहीं है।
जो यहाँ है, अपना है।
(फरवरी २०१०)
शोर है
और धूल-
जो वहां नहीं हैं।
शाल है,
कोट है
और गुनगुनी धुप -
जो वहां नहीं हैं।
सड़क किनारे बंधी भैंस,
गोबर के कंडे
और पेशाब के धब्बे -
जो वहां नहीं हैं।
समोसे हैं,
छोले
और गोल-गप्पे -
जो वहां नहीं हैं।
खटारा सड़क,
खटारा बस
और बेतरतीब ट्राफ्फिक-
जो वहां नहीं हैं।
जो वहां नहीं है, नहीं है।
जो यहाँ है, अपना है।
(फरवरी २०१०)
Monday, June 7, 2010
मैंने जीना चाहा
मैंने जीना चाहा
और खिड़की खोल दी।
बस,
इतना भर आकाश था।
घास का तिनका संभाले
सुबह एक
चिड़िया झांकने लगी
कहीं नींव के लिए;
पर मैं
जो खुद ठौर ढूँढ रहा,
वह मुझसे क्या पाएगी?
उसने कहा
तुम आकाश ढूँढ रहे हो,
मैं ज़मीन।
आओ
दोनों
थोड़ा
एक-दूसरे से ले लें।
(१९८० से २००५ के दरमयान)
और खिड़की खोल दी।
बस,
इतना भर आकाश था।
घास का तिनका संभाले
सुबह एक
चिड़िया झांकने लगी
कहीं नींव के लिए;
पर मैं
जो खुद ठौर ढूँढ रहा,
वह मुझसे क्या पाएगी?
उसने कहा
तुम आकाश ढूँढ रहे हो,
मैं ज़मीन।
आओ
दोनों
थोड़ा
एक-दूसरे से ले लें।
(१९८० से २००५ के दरमयान)
वृक्ष और पहाड़
मुझे वृक्ष होना है?
एक घनी छाँव
एक अदद हिम्मत
एक वरद हस्त।
किसने जाना है पतझड़
हर बसंत को नकारता हुआ?
कौन देखता है स्वप्न
बस
मौसम भर के लिए?
क्या तुमने कभी
आंधी के धपेड़ों को जिया है
सामने खड़े होकर?
पगलाई रूह के मानिंद
डोलता जिस्म
वस्त्र से निर्वस्त्र होता हुआ?
या
हताश रगों में
दरार पड़ जाए
जब आसमान सूख गया हो?
नहीं तो,
बादलों के हाहाकार में
क्या तुम कभी
ठिठुरते रह गए हों?
उसे तो फिर भी
खड़े रहना है
अविचल,
निर्निमेष,
सांस थामे हुए
क्योंकि
वुह वृक्ष है.
फिर
कितना सरल
हो जाता है
हमारा
बैठना उसकी छावं में.
मुझे पहाड़ होना है?
(१९८० से २००५ के दरमयान)
एक घनी छाँव
एक अदद हिम्मत
एक वरद हस्त।
किसने जाना है पतझड़
हर बसंत को नकारता हुआ?
कौन देखता है स्वप्न
बस
मौसम भर के लिए?
क्या तुमने कभी
आंधी के धपेड़ों को जिया है
सामने खड़े होकर?
पगलाई रूह के मानिंद
डोलता जिस्म
वस्त्र से निर्वस्त्र होता हुआ?
या
हताश रगों में
दरार पड़ जाए
जब आसमान सूख गया हो?
नहीं तो,
बादलों के हाहाकार में
क्या तुम कभी
ठिठुरते रह गए हों?
उसे तो फिर भी
खड़े रहना है
अविचल,
निर्निमेष,
सांस थामे हुए
क्योंकि
वुह वृक्ष है.
फिर
कितना सरल
हो जाता है
हमारा
बैठना उसकी छावं में.
मुझे पहाड़ होना है?
(१९८० से २००५ के दरमयान)
अंतिम पड़ाव
हँसते
हाँफते
चढ़ते गए हम।
कितना अच्छा था
सोच लेना
कि हम ऊपर जा रहे हैं
और जल्दी ही
पहुँच जायेंगे
उस बिंदु पर
जहाँ कोई
हिला नहीं
पायेगा हमें.
दूर तक
देखेगी
हमारी नज़र
अपनी विजय को फैले हुए
और
आसमान को चूमता,
हवा के पर्दों पर
फहराएगा हमारा नाम.
थकते,
हाँफते
चढ़े जा रहे हैं हम।
अब इतना ही
काफी है
मान लेना
कि हम ऊपर ही जा रहे हैं
और यह चोटी
शायद
आखरी पड़ाव होगा
अंतिम पहाड़ी का.
(१९८० से २००५ के दरमयान)
हाँफते
चढ़ते गए हम।
कितना अच्छा था
सोच लेना
कि हम ऊपर जा रहे हैं
और जल्दी ही
पहुँच जायेंगे
उस बिंदु पर
जहाँ कोई
हिला नहीं
पायेगा हमें.
दूर तक
देखेगी
हमारी नज़र
अपनी विजय को फैले हुए
और
आसमान को चूमता,
हवा के पर्दों पर
फहराएगा हमारा नाम.
थकते,
हाँफते
चढ़े जा रहे हैं हम।
अब इतना ही
काफी है
मान लेना
कि हम ऊपर ही जा रहे हैं
और यह चोटी
शायद
आखरी पड़ाव होगा
अंतिम पहाड़ी का.
(१९८० से २००५ के दरमयान)
ज़माना
बचपन
कैसा
रहा होगा,
कैसा यौवन।
तब हम
कहाँ-कहाँ नहीं गए
वीरान पहाड़ियों पर
घने जंगलों से होकर
या किसी अनजान शहर से
बेख़ौफ़, बेफिक्र
कहाँ-कहाँ नहीं रहे
रात हो या दिन।
अब
हाथ-पाँव
ज़रा सी हवा में भी
काँपने लगते हैं।
बच्चे पल भर नहीं हुए
बाहर गए,
हथेलिओं पर पसीना उभरने लगता है।
आंखें दरवाज़े पर
कील कि तरह गढ़ी रहती हैं
कि अभी आये नहीं।
मैं उम्र को कहूँ
या ज़माने को -
दोनों एक से नहीं रहे.
(२००० से २००८ के दरमयान)
कैसा
रहा होगा,
कैसा यौवन।
तब हम
कहाँ-कहाँ नहीं गए
वीरान पहाड़ियों पर
घने जंगलों से होकर
या किसी अनजान शहर से
बेख़ौफ़, बेफिक्र
कहाँ-कहाँ नहीं रहे
रात हो या दिन।
अब
हाथ-पाँव
ज़रा सी हवा में भी
काँपने लगते हैं।
बच्चे पल भर नहीं हुए
बाहर गए,
हथेलिओं पर पसीना उभरने लगता है।
आंखें दरवाज़े पर
कील कि तरह गढ़ी रहती हैं
कि अभी आये नहीं।
मैं उम्र को कहूँ
या ज़माने को -
दोनों एक से नहीं रहे.
(२००० से २००८ के दरमयान)
क्या छुआ था
क्या छुआ था हाथों ने?
एक हाथ,
उस पर रची मेहँदी,
या कोई दर्द?
क्या छुआ था, होठों ने?
क्या देखा था आँखों में?
काजल कि रेखा,
एक दर्पण,
या दो आंसू?
क्या झाँका था, मन में?
क्या कहा था जुबां ने?
ढाई अक्षर,
पांच शब्द,
एक वाक्य?
क्या कहा था, हांफते दिल ने?
(२००० से २००८ के दरमयान)
एक हाथ,
उस पर रची मेहँदी,
या कोई दर्द?
क्या छुआ था, होठों ने?
क्या देखा था आँखों में?
काजल कि रेखा,
एक दर्पण,
या दो आंसू?
क्या झाँका था, मन में?
क्या कहा था जुबां ने?
ढाई अक्षर,
पांच शब्द,
एक वाक्य?
क्या कहा था, हांफते दिल ने?
(२००० से २००८ के दरमयान)
खुशबू
कुछ गुजरा मेरे बगल से,
सरसराहट सी हुई,
मैं देख नहीं पाया,
जैसे कोई रूह,
अभी भी गर्म है
जिसका एहसास।
कुछ है ज़रूर
चमकता
बंद आँखों से परे
पर्दों व नकाबों से परे
जो खींचता है
सभी उलझनों के परे।
कुछ है ज़रूर
एक खुशबू
ताज़ा है जिसकी
भीनी महक।
(२००० से २००८ के दरमयान)
सरसराहट सी हुई,
मैं देख नहीं पाया,
जैसे कोई रूह,
अभी भी गर्म है
जिसका एहसास।
कुछ है ज़रूर
चमकता
बंद आँखों से परे
पर्दों व नकाबों से परे
जो खींचता है
सभी उलझनों के परे।
कुछ है ज़रूर
एक खुशबू
ताज़ा है जिसकी
भीनी महक।
(२००० से २००८ के दरमयान)
बारिश का रिश्ता
बारिश के आते ही
मै भाग कर पहुंचा
सड़क किनारे
एक बरामदे।
ऐसे समय
किसका घर है
सूझता नहीं;
कौन आ गया है,
कोई पूछता नहीं।
यह कैसा रिश्ता है
जो बारिश बांधती है,
जो टूटता है
बारिश के थमते ही?
(२००० से २००८ के दरमयान)
मै भाग कर पहुंचा
सड़क किनारे
एक बरामदे।
ऐसे समय
किसका घर है
सूझता नहीं;
कौन आ गया है,
कोई पूछता नहीं।
यह कैसा रिश्ता है
जो बारिश बांधती है,
जो टूटता है
बारिश के थमते ही?
(२००० से २००८ के दरमयान)
Thursday, May 27, 2010
A happiness bypassed
A word not whispered
A painting not touched
A music not played
A smile not beamed
A hand not caressed
An eye not met
A happiness bypassed.
And yet,
There was a whisper
A stroke of colour
A note of melody
A touch of warmth
A glance so gentle
A tentative heart so near.
Flowers bloomed in the bushes
Birds sang from the trees
The sea in the distance turned azure
The sunset came with an alpenglow.
A painting not touched
A music not played
A smile not beamed
A hand not caressed
An eye not met
A happiness bypassed.
And yet,
There was a whisper
A stroke of colour
A note of melody
A touch of warmth
A glance so gentle
A tentative heart so near.
Flowers bloomed in the bushes
Birds sang from the trees
The sea in the distance turned azure
The sunset came with an alpenglow.
Tuesday, April 20, 2010
पथभ्रष्ट
आओ आज
सड़क का नया नक्शा बनाएं।
पुरानी सड़क को
एक नया मोढ़ दे दें;
सीधे विस्तार को
कुछ मोढ़ों में बदल दें,
और छुटमुट मोढ़ों को
चौराहों में।
सभी कुछ नया हो -
अपरिचित, अजांचा।
आओ देखें,
हमे जहाँ जाना है,
वहां के लिए
कितनी जगह
हम
कितनी बार
पथभ्रष्ट हो सकते हैं।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
सड़क का नया नक्शा बनाएं।
पुरानी सड़क को
एक नया मोढ़ दे दें;
सीधे विस्तार को
कुछ मोढ़ों में बदल दें,
और छुटमुट मोढ़ों को
चौराहों में।
सभी कुछ नया हो -
अपरिचित, अजांचा।
आओ देखें,
हमे जहाँ जाना है,
वहां के लिए
कितनी जगह
हम
कितनी बार
पथभ्रष्ट हो सकते हैं।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
दूरियां
हम जिसे साथ कहते हैं
वह सिर्फ दूरी है
हमारे बीच की,
जिसे पाटने का
हम
निरर्थक प्रयास करते हैं।
यह प्रेम
शायद सिर्फ आभाव है -
या भय -
विकल्प का।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
वह सिर्फ दूरी है
हमारे बीच की,
जिसे पाटने का
हम
निरर्थक प्रयास करते हैं।
यह प्रेम
शायद सिर्फ आभाव है -
या भय -
विकल्प का।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
सफ़र
कैसे करेंगे तय
मंजिल सफ़र कि हम;
हर छावं में ढूँढते हैं
उम्र भर का सहारा।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
मंजिल सफ़र कि हम;
हर छावं में ढूँढते हैं
उम्र भर का सहारा।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
हडबडाहट
टटोलता हूँ शब्द
हडबडाहट के वार्तालाप में.
बीच कि हवा में
कितना कुछ
अनकहा,
अनछुआ रह जाता है।
हम
अनिर्णय से
शुरू होकर
उसी तक लौट आते हैं।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
हडबडाहट के वार्तालाप में.
बीच कि हवा में
कितना कुछ
अनकहा,
अनछुआ रह जाता है।
हम
अनिर्णय से
शुरू होकर
उसी तक लौट आते हैं।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
तुम कहाँ होती हो?
तुम कहाँ होती हो?
हवा सा बहता
चुप्पी का स्वर
मुझ तक आता है;
दर्द कि सिहरन
जाढ़ों कि पहली ठण्ड सी
मुझे छूती है;
यादों के गर्म कपरों को
मैं धूप देने लगता हूँ.
उस समय
तुम कहाँ होती हो?
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
हवा सा बहता
चुप्पी का स्वर
मुझ तक आता है;
दर्द कि सिहरन
जाढ़ों कि पहली ठण्ड सी
मुझे छूती है;
यादों के गर्म कपरों को
मैं धूप देने लगता हूँ.
उस समय
तुम कहाँ होती हो?
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
बौखलाहट
अतीत
अब कोई नींव नहीं,
न भविष्य का ही कोई चेहरा।
दोनों ही
वर्तमान कि
बौखलाहट में
गुम गए हैं।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
अब कोई नींव नहीं,
न भविष्य का ही कोई चेहरा।
दोनों ही
वर्तमान कि
बौखलाहट में
गुम गए हैं।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
एक बीता क्षण
एक क्षण
बीता हुआ,
एक हंसी
गुज़री हुई।
पृथ्वी घूम कर
फिर
वहीँ से गुजरेगी
कि नहीं,
अब देखना है।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
बीता हुआ,
एक हंसी
गुज़री हुई।
पृथ्वी घूम कर
फिर
वहीँ से गुजरेगी
कि नहीं,
अब देखना है।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
हक
हम
आगे बढ़ेगें
तो
क्या पीछे नहीं देखेंगे?
ज़िन्दगी
सीढ़ी सड़क नहीं।
हर मोढ़ पर
चेहरा
उसी ओर होगा
जहाँ से हम गुज़रे थे।
कमजोरी
हर आदमी का हक है।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
आगे बढ़ेगें
तो
क्या पीछे नहीं देखेंगे?
ज़िन्दगी
सीढ़ी सड़क नहीं।
हर मोढ़ पर
चेहरा
उसी ओर होगा
जहाँ से हम गुज़रे थे।
कमजोरी
हर आदमी का हक है।
(१९८० से २००५ के दरम्यान)
Wednesday, March 31, 2010
Memories of a tragedy
Going through the motions.
Terminally ill waiting for the last breath,
Or the not terminally ill
Awaiting the drone of death.
Working, eating, sleeping, breathing.
In the morning
Getting into the shoes or whatever,
Into the car or whatever
Into the office or whatever.
At night the couple turn over
After a bout of heavy breathing
For a sleeping pill.
Another night passes its hours
For another day to exhaust soon enough.
I watch the sun rise over the sea
And sink behind the hill.
Or is it the other way around?
It doesn't matter.
The view from the sixteenth
No longer makes me yearn for the life of birds
Which have been fogged out
And parodies of trees shifted
On to the roof of the multi-storey.
I look down the window
It more feels like
Eyes looking down
From a face hanging from the ceiling.
***
Penang, 2009-2010
Terminally ill waiting for the last breath,
Or the not terminally ill
Awaiting the drone of death.
Working, eating, sleeping, breathing.
In the morning
Getting into the shoes or whatever,
Into the car or whatever
Into the office or whatever.
At night the couple turn over
After a bout of heavy breathing
For a sleeping pill.
Another night passes its hours
For another day to exhaust soon enough.
I watch the sun rise over the sea
And sink behind the hill.
Or is it the other way around?
It doesn't matter.
The view from the sixteenth
No longer makes me yearn for the life of birds
Which have been fogged out
And parodies of trees shifted
On to the roof of the multi-storey.
I look down the window
It more feels like
Eyes looking down
From a face hanging from the ceiling.
***
Penang, 2009-2010
Tuesday, January 26, 2010
अंधियारे के कुछ दिन
उन्होंने मुझे काला चश्मा दिया
जानते हुए कि
संभाल नहीं पाएंगी मेरी आँखे
यकायक उजाला;
या वे पहचानते थे
आदमी का बेचैन मन
जो क्षण भर भी नहीं रहना चाहता था
अँधा।
उन कम दिनों मे ही
जब मेरे चारों ओर धुंध गहरा गया,
मैं वाकई डर गया था
कि मैं अब देख नहीं पाऊंगा इन्द्रधनुष,
न वे आँखें
जिन्हें देखने के लिए मैं तरसता हूँ,
न उनमे उभरती मुस्कराहट ही।
उन दिनों
वो सब खो जाने का भय हो गया था
जो खूबसूरत थीं,
या मुझे लगने लगीं थीं,
जैसे सब कुछ।
मैं देख नहीं रहा था दुनिया का मटमैलापन,
नहीं दिख रही थी भुखमरी,
नंगे होते जंगल,
सुखा दी जा रही नदियाँ,
हाशिये पे धकेले जा रहे लोग,
आत्महत्या करते किसान।
मैंने आँखें फेर ली थीं
और अब मुझे सुनाई भी नहीं दे रहा था।
. . . . . . .
लेकिन क्या मेरे भर नहीं देखने से
रंग अपना फूल खो देते ?
मिठास अपनी तितलियाँ ?
या मेरे न देखने से
थम जाती रक्त कि नदियाँ
जो गावों तक बह रही थीं -
नदी का लाल रंग
जो शहरों से निकल रहा था।
1 नवम्बर 2009 (अगस्त में आँख के ऑपरेशन के बाद)
जानते हुए कि
संभाल नहीं पाएंगी मेरी आँखे
यकायक उजाला;
या वे पहचानते थे
आदमी का बेचैन मन
जो क्षण भर भी नहीं रहना चाहता था
अँधा।
उन कम दिनों मे ही
जब मेरे चारों ओर धुंध गहरा गया,
मैं वाकई डर गया था
कि मैं अब देख नहीं पाऊंगा इन्द्रधनुष,
न वे आँखें
जिन्हें देखने के लिए मैं तरसता हूँ,
न उनमे उभरती मुस्कराहट ही।
उन दिनों
वो सब खो जाने का भय हो गया था
जो खूबसूरत थीं,
या मुझे लगने लगीं थीं,
जैसे सब कुछ।
मैं देख नहीं रहा था दुनिया का मटमैलापन,
नहीं दिख रही थी भुखमरी,
नंगे होते जंगल,
सुखा दी जा रही नदियाँ,
हाशिये पे धकेले जा रहे लोग,
आत्महत्या करते किसान।
मैंने आँखें फेर ली थीं
और अब मुझे सुनाई भी नहीं दे रहा था।
. . . . . . .
लेकिन क्या मेरे भर नहीं देखने से
रंग अपना फूल खो देते ?
मिठास अपनी तितलियाँ ?
या मेरे न देखने से
थम जाती रक्त कि नदियाँ
जो गावों तक बह रही थीं -
नदी का लाल रंग
जो शहरों से निकल रहा था।
1 नवम्बर 2009 (अगस्त में आँख के ऑपरेशन के बाद)
Saturday, January 23, 2010
बारिश
पिछली दो रातों और उनके दरमियान ठहरे छुट्टी के
दिन भर
बारिश होती रही।
समुद्र से उठते द्वीपों के ऊपर झुके बादलों कि लटों में
मुझे घर छोढ़े,
भादों का लौट आना सा दिखा,
जब कि वहां इस साल उसकी गुमशदगी कि चिंताएं
दीवारों पे चस्पे इश्तेहारों में दिखती हैं,
हालांकि अभी गहन तहकीकात होना बाकि है,
व उसको मनाने के लिए कुछ इंतज़ाम भी।
बगल किसी दूसरी खिढ़की के ऊपर
टिन पर बूंदों के आवेश से
मैं समझने लगा हूँ कि
बौछार कि दिशा किस ओर होगी।
समुद्र से उठती हवाओं से,
बारिश के परदे पर हवा का बदलता रुख
हर कुछ मिनट
मैं देख पाता हूँ
कि सोलहवीं मंजिल पर अपने इकलौते कमरे में
उसकी फुहार पहुंचेगी कि नहीं
खिढ़की के उस महीन दरार से
जिस तक मैं पहुँच नहीं पाता हूँ।
बस इतना ही कर पाता हूँ कि
छ इंच बाएं या चार इंच दायें सरका लूं
मल्टिपल प्लग, पंखा, दरी व ज़मीन पर बिछा
अपना बिस्तर,
जितनी भर गुंजाइश है।
या फिर,
नहीं ही करता हूँ।
आखिर बारिश भी तो इतनी प्यास के बाद आई है।
-- 26 अगस्त 2009
दिन भर
बारिश होती रही।
समुद्र से उठते द्वीपों के ऊपर झुके बादलों कि लटों में
मुझे घर छोढ़े,
भादों का लौट आना सा दिखा,
जब कि वहां इस साल उसकी गुमशदगी कि चिंताएं
दीवारों पे चस्पे इश्तेहारों में दिखती हैं,
हालांकि अभी गहन तहकीकात होना बाकि है,
व उसको मनाने के लिए कुछ इंतज़ाम भी।
बगल किसी दूसरी खिढ़की के ऊपर
टिन पर बूंदों के आवेश से
मैं समझने लगा हूँ कि
बौछार कि दिशा किस ओर होगी।
समुद्र से उठती हवाओं से,
बारिश के परदे पर हवा का बदलता रुख
हर कुछ मिनट
मैं देख पाता हूँ
कि सोलहवीं मंजिल पर अपने इकलौते कमरे में
उसकी फुहार पहुंचेगी कि नहीं
खिढ़की के उस महीन दरार से
जिस तक मैं पहुँच नहीं पाता हूँ।
बस इतना ही कर पाता हूँ कि
छ इंच बाएं या चार इंच दायें सरका लूं
मल्टिपल प्लग, पंखा, दरी व ज़मीन पर बिछा
अपना बिस्तर,
जितनी भर गुंजाइश है।
या फिर,
नहीं ही करता हूँ।
आखिर बारिश भी तो इतनी प्यास के बाद आई है।
-- 26 अगस्त 2009
Friday, January 22, 2010
दोराहा
मैंने अपने को एक दोराहा पर पाया
बदकिस्मती और खुशकिस्मती के बीच।
समझ मे नहीं आया
कि शिकायत करूँ
तो किससे
कि दो रास्ते क्यों;
या धन्यवाद दूं
तो किसे
कि कम से कम दो रास्ते तो हैं
जिनमे से एक खुशियों कि मंजिल तक पहुंचाता है।
मगर मै तय नहीं कर पाया कि कौन सा रास्ता लूं।
दोराहे पर कोई दिशा निर्देश नहीं था,
तिसपर, कोई बगल से गुजरता
चुपके से यह भी कह गया कि
कोई भी रास्ता सीधा नहीं होता।
तो क्या,
मैं ख़ुशी का रास्ता लूँगा
और वो
घूम फिर कर बदकिस्मती में जा मिलेगा?
पर परेशानी इस बात को लेकर नहीं थी
न इस बात को लेकर ही कि
ख़ुशी व बदकिस्मती भी तय नहीं कर पाए कि
उन्हें अपना-अपना रास्ता चुनना है।
मेरी परेशानी थी
मै तय नहीं कर पाया कि पहले किसे चुनुं -
खुशकिस्मती को या बदकिस्मती?
यह भी तो नहीं पता कि
अलग-अलग हिस्सों में
दोनों रास्ते कितने लम्बे हैं,
दूसरे में मिलने से पहले.
और परेशानी यह भी थी कि
अगर ख़ुशी या बदकिस्मती को
अपने-अपने रास्ते नहीं पकढ़ने थे
तो एक ही रास्ते पे क्यों न चल पढ़े,
ताकि मेरे सामने दोराहा तो नहीं होता.
और इसी असम्न्ज्मस व हिचक में
मैं दोराहा पर ठहरा रह गया
ज़िन्दगी भर।
अब मै तय नहीं कर पा रहा हूँ कि
धन्यवाद दूं
कि कोई जोखिम नहीं उठाया,
या पछताऊं
कि कोई जोखिम नहीं उठाया.
बदकिस्मती और खुशकिस्मती के बीच।
समझ मे नहीं आया
कि शिकायत करूँ
तो किससे
कि दो रास्ते क्यों;
या धन्यवाद दूं
तो किसे
कि कम से कम दो रास्ते तो हैं
जिनमे से एक खुशियों कि मंजिल तक पहुंचाता है।
मगर मै तय नहीं कर पाया कि कौन सा रास्ता लूं।
दोराहे पर कोई दिशा निर्देश नहीं था,
तिसपर, कोई बगल से गुजरता
चुपके से यह भी कह गया कि
कोई भी रास्ता सीधा नहीं होता।
तो क्या,
मैं ख़ुशी का रास्ता लूँगा
और वो
घूम फिर कर बदकिस्मती में जा मिलेगा?
पर परेशानी इस बात को लेकर नहीं थी
न इस बात को लेकर ही कि
ख़ुशी व बदकिस्मती भी तय नहीं कर पाए कि
उन्हें अपना-अपना रास्ता चुनना है।
मेरी परेशानी थी
मै तय नहीं कर पाया कि पहले किसे चुनुं -
खुशकिस्मती को या बदकिस्मती?
यह भी तो नहीं पता कि
अलग-अलग हिस्सों में
दोनों रास्ते कितने लम्बे हैं,
दूसरे में मिलने से पहले.
और परेशानी यह भी थी कि
अगर ख़ुशी या बदकिस्मती को
अपने-अपने रास्ते नहीं पकढ़ने थे
तो एक ही रास्ते पे क्यों न चल पढ़े,
ताकि मेरे सामने दोराहा तो नहीं होता.
और इसी असम्न्ज्मस व हिचक में
मैं दोराहा पर ठहरा रह गया
ज़िन्दगी भर।
अब मै तय नहीं कर पा रहा हूँ कि
धन्यवाद दूं
कि कोई जोखिम नहीं उठाया,
या पछताऊं
कि कोई जोखिम नहीं उठाया.
Tuesday, January 19, 2010
A beginning - at last
(On starting the blog)
At last.
At last is a point where you "reach". A point when you can say you have "achieved", or "failed".
At last is the end of the road, the top of the mountain, the night. A time to repose.
At last is "the end", when the curtains come down.
But here, at last, I make a beginning.
Is it because there is no end of the road, no top of the mountain, no night?
Or is it because there is always something beyond the end of the road, always something higher than the top of the mountain?
At last - because night is the beginning of a morning, December is the beginning of January.
At last - a time to renew.
A beginning - at last.
At last.
At last is a point where you "reach". A point when you can say you have "achieved", or "failed".
At last is the end of the road, the top of the mountain, the night. A time to repose.
At last is "the end", when the curtains come down.
But here, at last, I make a beginning.
Is it because there is no end of the road, no top of the mountain, no night?
Or is it because there is always something beyond the end of the road, always something higher than the top of the mountain?
At last - because night is the beginning of a morning, December is the beginning of January.
At last - a time to renew.
A beginning - at last.
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