भीड़ है,
शोर है
और धूल-
जो वहां नहीं हैं।
शाल है,
कोट है
और गुनगुनी धुप -
जो वहां नहीं हैं।
सड़क किनारे बंधी भैंस,
गोबर के कंडे
और पेशाब के धब्बे -
जो वहां नहीं हैं।
समोसे हैं,
छोले
और गोल-गप्पे -
जो वहां नहीं हैं।
खटारा सड़क,
खटारा बस
और बेतरतीब ट्राफ्फिक-
जो वहां नहीं हैं।
जो वहां नहीं है, नहीं है।
जो यहाँ है, अपना है।
(फरवरी २०१०)
Friday, June 18, 2010
Monday, June 7, 2010
मैंने जीना चाहा
मैंने जीना चाहा
और खिड़की खोल दी।
बस,
इतना भर आकाश था।
घास का तिनका संभाले
सुबह एक
चिड़िया झांकने लगी
कहीं नींव के लिए;
पर मैं
जो खुद ठौर ढूँढ रहा,
वह मुझसे क्या पाएगी?
उसने कहा
तुम आकाश ढूँढ रहे हो,
मैं ज़मीन।
आओ
दोनों
थोड़ा
एक-दूसरे से ले लें।
(१९८० से २००५ के दरमयान)
और खिड़की खोल दी।
बस,
इतना भर आकाश था।
घास का तिनका संभाले
सुबह एक
चिड़िया झांकने लगी
कहीं नींव के लिए;
पर मैं
जो खुद ठौर ढूँढ रहा,
वह मुझसे क्या पाएगी?
उसने कहा
तुम आकाश ढूँढ रहे हो,
मैं ज़मीन।
आओ
दोनों
थोड़ा
एक-दूसरे से ले लें।
(१९८० से २००५ के दरमयान)
वृक्ष और पहाड़
मुझे वृक्ष होना है?
एक घनी छाँव
एक अदद हिम्मत
एक वरद हस्त।
किसने जाना है पतझड़
हर बसंत को नकारता हुआ?
कौन देखता है स्वप्न
बस
मौसम भर के लिए?
क्या तुमने कभी
आंधी के धपेड़ों को जिया है
सामने खड़े होकर?
पगलाई रूह के मानिंद
डोलता जिस्म
वस्त्र से निर्वस्त्र होता हुआ?
या
हताश रगों में
दरार पड़ जाए
जब आसमान सूख गया हो?
नहीं तो,
बादलों के हाहाकार में
क्या तुम कभी
ठिठुरते रह गए हों?
उसे तो फिर भी
खड़े रहना है
अविचल,
निर्निमेष,
सांस थामे हुए
क्योंकि
वुह वृक्ष है.
फिर
कितना सरल
हो जाता है
हमारा
बैठना उसकी छावं में.
मुझे पहाड़ होना है?
(१९८० से २००५ के दरमयान)
एक घनी छाँव
एक अदद हिम्मत
एक वरद हस्त।
किसने जाना है पतझड़
हर बसंत को नकारता हुआ?
कौन देखता है स्वप्न
बस
मौसम भर के लिए?
क्या तुमने कभी
आंधी के धपेड़ों को जिया है
सामने खड़े होकर?
पगलाई रूह के मानिंद
डोलता जिस्म
वस्त्र से निर्वस्त्र होता हुआ?
या
हताश रगों में
दरार पड़ जाए
जब आसमान सूख गया हो?
नहीं तो,
बादलों के हाहाकार में
क्या तुम कभी
ठिठुरते रह गए हों?
उसे तो फिर भी
खड़े रहना है
अविचल,
निर्निमेष,
सांस थामे हुए
क्योंकि
वुह वृक्ष है.
फिर
कितना सरल
हो जाता है
हमारा
बैठना उसकी छावं में.
मुझे पहाड़ होना है?
(१९८० से २००५ के दरमयान)
अंतिम पड़ाव
हँसते
हाँफते
चढ़ते गए हम।
कितना अच्छा था
सोच लेना
कि हम ऊपर जा रहे हैं
और जल्दी ही
पहुँच जायेंगे
उस बिंदु पर
जहाँ कोई
हिला नहीं
पायेगा हमें.
दूर तक
देखेगी
हमारी नज़र
अपनी विजय को फैले हुए
और
आसमान को चूमता,
हवा के पर्दों पर
फहराएगा हमारा नाम.
थकते,
हाँफते
चढ़े जा रहे हैं हम।
अब इतना ही
काफी है
मान लेना
कि हम ऊपर ही जा रहे हैं
और यह चोटी
शायद
आखरी पड़ाव होगा
अंतिम पहाड़ी का.
(१९८० से २००५ के दरमयान)
हाँफते
चढ़ते गए हम।
कितना अच्छा था
सोच लेना
कि हम ऊपर जा रहे हैं
और जल्दी ही
पहुँच जायेंगे
उस बिंदु पर
जहाँ कोई
हिला नहीं
पायेगा हमें.
दूर तक
देखेगी
हमारी नज़र
अपनी विजय को फैले हुए
और
आसमान को चूमता,
हवा के पर्दों पर
फहराएगा हमारा नाम.
थकते,
हाँफते
चढ़े जा रहे हैं हम।
अब इतना ही
काफी है
मान लेना
कि हम ऊपर ही जा रहे हैं
और यह चोटी
शायद
आखरी पड़ाव होगा
अंतिम पहाड़ी का.
(१९८० से २००५ के दरमयान)
ज़माना
बचपन
कैसा
रहा होगा,
कैसा यौवन।
तब हम
कहाँ-कहाँ नहीं गए
वीरान पहाड़ियों पर
घने जंगलों से होकर
या किसी अनजान शहर से
बेख़ौफ़, बेफिक्र
कहाँ-कहाँ नहीं रहे
रात हो या दिन।
अब
हाथ-पाँव
ज़रा सी हवा में भी
काँपने लगते हैं।
बच्चे पल भर नहीं हुए
बाहर गए,
हथेलिओं पर पसीना उभरने लगता है।
आंखें दरवाज़े पर
कील कि तरह गढ़ी रहती हैं
कि अभी आये नहीं।
मैं उम्र को कहूँ
या ज़माने को -
दोनों एक से नहीं रहे.
(२००० से २००८ के दरमयान)
कैसा
रहा होगा,
कैसा यौवन।
तब हम
कहाँ-कहाँ नहीं गए
वीरान पहाड़ियों पर
घने जंगलों से होकर
या किसी अनजान शहर से
बेख़ौफ़, बेफिक्र
कहाँ-कहाँ नहीं रहे
रात हो या दिन।
अब
हाथ-पाँव
ज़रा सी हवा में भी
काँपने लगते हैं।
बच्चे पल भर नहीं हुए
बाहर गए,
हथेलिओं पर पसीना उभरने लगता है।
आंखें दरवाज़े पर
कील कि तरह गढ़ी रहती हैं
कि अभी आये नहीं।
मैं उम्र को कहूँ
या ज़माने को -
दोनों एक से नहीं रहे.
(२००० से २००८ के दरमयान)
क्या छुआ था
क्या छुआ था हाथों ने?
एक हाथ,
उस पर रची मेहँदी,
या कोई दर्द?
क्या छुआ था, होठों ने?
क्या देखा था आँखों में?
काजल कि रेखा,
एक दर्पण,
या दो आंसू?
क्या झाँका था, मन में?
क्या कहा था जुबां ने?
ढाई अक्षर,
पांच शब्द,
एक वाक्य?
क्या कहा था, हांफते दिल ने?
(२००० से २००८ के दरमयान)
एक हाथ,
उस पर रची मेहँदी,
या कोई दर्द?
क्या छुआ था, होठों ने?
क्या देखा था आँखों में?
काजल कि रेखा,
एक दर्पण,
या दो आंसू?
क्या झाँका था, मन में?
क्या कहा था जुबां ने?
ढाई अक्षर,
पांच शब्द,
एक वाक्य?
क्या कहा था, हांफते दिल ने?
(२००० से २००८ के दरमयान)
खुशबू
कुछ गुजरा मेरे बगल से,
सरसराहट सी हुई,
मैं देख नहीं पाया,
जैसे कोई रूह,
अभी भी गर्म है
जिसका एहसास।
कुछ है ज़रूर
चमकता
बंद आँखों से परे
पर्दों व नकाबों से परे
जो खींचता है
सभी उलझनों के परे।
कुछ है ज़रूर
एक खुशबू
ताज़ा है जिसकी
भीनी महक।
(२००० से २००८ के दरमयान)
सरसराहट सी हुई,
मैं देख नहीं पाया,
जैसे कोई रूह,
अभी भी गर्म है
जिसका एहसास।
कुछ है ज़रूर
चमकता
बंद आँखों से परे
पर्दों व नकाबों से परे
जो खींचता है
सभी उलझनों के परे।
कुछ है ज़रूर
एक खुशबू
ताज़ा है जिसकी
भीनी महक।
(२००० से २००८ के दरमयान)
बारिश का रिश्ता
बारिश के आते ही
मै भाग कर पहुंचा
सड़क किनारे
एक बरामदे।
ऐसे समय
किसका घर है
सूझता नहीं;
कौन आ गया है,
कोई पूछता नहीं।
यह कैसा रिश्ता है
जो बारिश बांधती है,
जो टूटता है
बारिश के थमते ही?
(२००० से २००८ के दरमयान)
मै भाग कर पहुंचा
सड़क किनारे
एक बरामदे।
ऐसे समय
किसका घर है
सूझता नहीं;
कौन आ गया है,
कोई पूछता नहीं।
यह कैसा रिश्ता है
जो बारिश बांधती है,
जो टूटता है
बारिश के थमते ही?
(२००० से २००८ के दरमयान)
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