Thursday, May 4, 2017

मुझे खून चाहिए

"मुझे खून चाहिए," उन्होंने कहा था।
            किसने कहा था?
सुभाषजी ने।
            सुभाष कौन?
ज़रा आदर  से नाम लो - सुभाष नहीं, सुभाषजी।
तुम  नहीं जानते कौन सुभाषजी ?
            तुम किस सुभाषजी की बात कर रहे हो?
बड़े देशद्रोही हो जो सुभाषजी को नहीं जानते।
एक ही तो  सुभाषजी हैं
जिन्होंने ऐसा कहा था।
             अच्छा तो तुम्हारा मतलब सुभाष चंद्र बोस से है !
            उन्होंने ऐसा कहा था?
हाँ! उन्होंने ही तो कहा था "मुझे खून चाहिए।"
उन्होंने ही कहा था देश खून मांग रहा है।
ऐसा कहा था सुभाषजी ने।
            पर सुभाषजी ने तो कहा था, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे ....."
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- बीच में ही टोकते हुए -
देश के खातिर।  धर्म के लिए
उन्होंने खून माँगा था।
            तो तुमने दिया खून?
हाँ! दिया,
अख़लाक़ का
और अब पहलु का। 


* * *
३  अप्रैल  २०१७ 

Tuesday, November 15, 2016

मेरे शरीर का तुम क्या करोगे?

मैं  जब मरूंगा 
तो मेरे शरीर का तुम क्या करोगे?
वैसे, 
दफ़नाओगे तो अच्छा रहेगा । 
मैं ताज़िन्दगी 
ज़मीन से जुड़ा रहा 
अब मर का उसका साथ छोड़ना 
ठीक नहीं रहेगा। 

मगर तुम 
मेरे शरीर को दफ़्नाओगे नहीं;
अग्नि को दोगे। 

तुम मेरा शरीर 
अग्नि को दोगे 
तो उसकी राख का क्या करोगे ?
अगर गंगा में बहाने की सोचोगे 
तो मत करना। 
बेहतर होगा 
उस राख को घर ले जा कर 
बर्तन धोने के काम में लाना। 
हो सकता है 
चमकते बर्तनों में 
दो-एक दिन और 
तुम मेरा अक्स देख सको। 

और हाँ!
ध्यान रखना 
कि जिन लकड़ियों से 
तुम चिता सजाओगे 
वे उन ही पेड़ों की हों 
जो मैंने अपनी ज़िन्दगी में  लगाए। 
मेरे कर्म 
मेरे भी काम आ सकें 
वह भी सही होगा। 

नहीं तो 
वे लकड़ियां उन पेड़ों की हों 
जो किसी मज़ार पर लगे, उगे हों। 
कम से कम 
मृत्यू के बाद ही सही 
हम 
एक-दूसरे के काम तो आएं। 

और अगर फिर भी ऐसा पेड़ न मिले, 
तो मेरी स्मृति में
एक पेड़ ज़रूर लगा देना  
जो किसी आने वाली पीढ़ी  के 
शव के
 दाह  संस्कार के काम आ सकें।

* * *
१३ अक्टूबर २०१६ 

बच्चे स्कूल जाने लगे हैं

बच्चे जब से
स्कूल जाने लगें हैं
गांव में गोपालन कम हुआ है
और अब कम हो रहा है
कुछ और भी कारणों से।

अच्छा ही हुआ
बच्चे स्कूल जाने लगे हैं
हालांकि
स्कूल जाने व गोपालन कम होने
में
परस्पर सम्बन्ध
या
स्कूल जाने व गोपालन कम होने
का नफ़ा - नुकसान
मैं ठीक से समझ नहीं पाया हूँ।

हो सकता है
स्कूल में
वे जो सीख रहे हैं,
गोपालन में वे नहीं सीखते।
वे सीखते कुछ और
व कुछ और
जो वे शायद
स्कूल में नहीं सीख रहे।
शायद वे सीखते
कुछ जीवन के
और उसकी लीला
के बारे में।

खैर
अच्छा ही हुआ
वे स्कूल जाने लगे हैं
और गोपालन कम हुआ है
नहीं तो
वे गायों को चराते फिरते
और खामख्वाह
उन की जान पे बन आती।

* * *
अक्टूबर  २०१६ 

अपनी मृत्यू पर बात

हम
सब कुछ पर बात
कर लेते हैं
मगर मृत्यू पर नहीं;
कम से कम
अपनी मृत्यू पर तो नहीं ही।

आओ
जीते जी
हम मृत्यू पर बात कर लें;
अपनी मृत्यू पर।
इसे और टालना अब ठीक नहीं।

मृत्यू अवश्यम्भावी तो है ही
लेकिन इधर कुछ समय से
कुछ और भी अवश्यम्भावी  बन गयी है।
और मृत्यू तो कभी भी,
कहीं भी
हो सकती है
लेकिन इधर कुछ समय से
वाकई कभी भी,
कहीं भी
हो सकती है।

आओ
जीते जी
हम मृत्यू पर बात कर लें;
अपनी मृत्यू पर।

* * *

अक्टूबर  २०१६ 

Wednesday, January 20, 2016

एक अधूरी कविता - वेमुला के लिए


मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकता, रोहित
सिवाय एक अधूरी कविता लिखने के।
पर 
मैं परेशान हूँ
पिछले दो दिनों से।
क्या इसलिए कि
वास्तव में
तुम्हारी मृत्यु में मेरा भी हाथ था
और ये सिर्फ मुझे ही पता है;
या इसलिए
कि तुम्हारी आत्महत्या
मुझे रूबरू कराती है
अपनी मृत्यु से,
अपने अंदर जड़ता से,
उस लोथ से
जो अब खून से
संचारित भी नहीँ होता
क्योंकि वो कभी का मर चुका है।
तो शायद
आत्महत्या
मेरी थी;
तुम्हारी तो शहादत थी -
हालांकि
शहादत शब्द से भी
मुझे अब कभी कभी
बेचैनी होने लगती है।
***
२१ जनवरी २०१६ 

Friday, December 4, 2015

कभी-कभी

कितना फर्क पड़ेगा
अगर मुझे आभास हो जाये,
आभास नहीं,
निश्चित मालूम पड़ जाये
की मुझे अब कितने दिन जीना है -
और ये दिन ज्यादा न हों।

पर ज्यादा कितना होता है?

कभी-कभी,
या अक्सर ही,
एक दिन भी बहुत ज्यादा,
बहुत भारी लगता है;
या कभी-कभी,
शायद कभी ही
सौ दिन भी चुटकी में ही
फिसल जाते हैं।

तो कितना फर्क पड़ेगा?

क्या मैं अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरी करूंगा?
जो पूर्ण होती दिखने के बाद भी
वास्तव में अब तक अपूर्ण रही
बरसों बाद भी।

वाकई क्या फर्क पड़ेगा?

कम जीना होगा
तो क्या मैं बेहतर जीऊंगा ?
तिल-तिल मरूंगा नहीं,
पल-पल गलूँगा नहीं
हर क्षण पूरी तरह जियूँगा।

पर यह मैं पहले ही कैसे कह सकता हूँ?
क्योंकि
जीना औरों से भी होता है।


महिला और पलायन

हे परवरदिगार
मेरा हौंसला बना रहे
कि मै बनी रहूँ
अपनी मिट्टी से।
छिटक चांदनी पड़ती रहे
मेरे बेशक दरकते घर पर
जिससे
उग आये झाड़-झंखाड़ के बीच
वो अपना रास्ता ढूंढें
और अपना घर
पहचान सकें।

हे परवरदिगार,
मेरी साँस बनी रहे
आखिरी पठाल के गिरने तक।

* * *
मई २०१५