Sunday, August 4, 2013

माँ और बरसात - 1

माँ और बरसात - 1

माँ
तू कहती थी
बरसात उम्मीदों का मौसम होता है -
पर वो तेरे समय की बात रही होगी।

कितने बरस हो गए हैं तुझे गए
पर मैं आज भी देखता हूँ
ज़मीन से चीटियों के दल का निकलना
तो सोचना चाहता हूँ कि समय दरवाजे पे है
लीचियों मे रस भर जाने का,
जैसा तू कहती थी.

निरी धूप मे बोये बीजों की जड़ों पर
सुबह-शाम
चुल्लू-चुल्लू पानी उंडेलते हुए
तू मेरी सवालिया आँखों से कहती
देख, बस चंद  दिनों का इंतज़ार है
और फिर होड़ लग जाएगी
धान, दाल  और सब्जियों के बीच
घास और खरपतवारों मे  भी
उगने, बढ़ने की.

कितना भरोसा था
तुझे बरसात पर
और वो भी था कि
कभी थोड़ी शरारत
कभी थोडा रूठ ज़रूर जाता
पर धोखा नहीं देता था.

कुछ खुद उग आये,
शायद पिछली फसल के भूले-बिसरे बीजों से,
पत्तीदार हरी सब्जियों
या जंगली पत्तियों की ओर इशारा कर
तू कहती, देख
बरसात की उम्मीद और वायदे पर
क्या-क्या जीवन नहीं होता।
हल्दी की चौड़ी पत्तियों पर हाथ फेर
तू गिनने लगती
कि इस बार किन-किनको बाँटनी है
और कहती
होता है, तभी तो देती हूँ;
बारिश नहीं होती तो कहाँ से देती?

हाँ माँ
तू कहती थी
बरसात उम्मीदों का मौसम होता है -
पर वो तेरे समय की बात रही होगी
क्योंकि तेरे कोठार
कभी खाली नहीं रहते थे.

मेरे बच्चे तो बरसात को
त्रासदी का मौसम कहते हैं.

शायद मै गवाह हूँ
या गुनहगार
जिसने उम्मीद को त्रासदी मे  बदलते देखा
जिसने उम्मीद को त्रासदी मे  बदलने दिया।

* * *
२१  जुलाई २०१३