Sunday, April 29, 2012

मैं वह भी हूँ जो नहीं हूँ

मुझे दोनों देखने हैं -
जो मुझे दिखता है 
और जो नहीं दिखता है.
तभी मैं पूरा देख पाऊंगा.

जो नहीं दिखता है 
उसके बगैर 
जो दिखता है 
वह अधूरा है 
जैसे एक स्वप्न 
या एक भ्रम.

मैं वह भी हूँ
जो मैं नहीं हूँ.


* * *
३० अप्रैल २०१२ 

Sunday, April 15, 2012

शायद

विपिन पारीख

मुझे मेवाड़ में मीरा मिली नहीं.
वृन्दावन में राधा मिली नहीं.
पर शायद
इसमे मेरा भी दोष हो.
मैंने मुंबई छोड़ी ही न हो.

***
जनसत्ता, १५ अप्रैल 2012

Monday, January 23, 2012

बीच का फासला

मैं सामने था,
तुमने देखा नहीं;
देखा भी, तो बीच में
एक फासला था
वक्त का -
एक नदी की तरह
जो वही होते हुए भी
वही नहीं थी.

***
३ मई २००९ 



Thursday, January 12, 2012

पिताजी की स्वेटर

ये पिताजी की स्वेटर है.

पिताजी इस साल एक सौ एक के हो गए हैं,
और माँ सौ की -
या वे हो जाते.

पर "वे हो गए हैं"
मैं ऐसा ही कहूँगा
क्योंकि वे अब भी यहीं हैं
इस स्वेटर में
जिसे मेरे पिताजी पहनते थे,
जिसे मेरी माँ ने बुना था,
जिसे अब मैं पहनता हूँ.

शायद तभी
रिश्तेदार और पारिवारिक मित्र
कहने लगे हैं कि
मैं साल-दर-साल
अपने पिताजी की शक्ल में ढल रहा हूँ
और मेरी कई आदतें अपनी माँ से मिलने लगी हैं.

मैं अलग डील-डौल का होते हुए भी
देखता हूँ
स्वेटर अब मुझपर ठीक बैठने लगी है
और नर्म गर्म लगती है
इन सर्द दिनों में.

__
१३ जनवरी २०१२