Tuesday, January 26, 2010

अंधियारे के कुछ दिन

उन्होंने मुझे काला चश्मा दिया
जानते हुए कि
संभाल नहीं पाएंगी मेरी आँखे
यकायक उजाला;
या वे पहचानते थे
आदमी का बेचैन मन
जो क्षण भर भी नहीं रहना चाहता था
अँधा।


उन कम दिनों मे ही
जब मेरे चारों ओर धुंध गहरा गया,
मैं वाकई डर गया था
कि मैं अब देख नहीं पाऊंगा इन्द्रधनुष,
न वे आँखें
जिन्हें देखने के लिए मैं तरसता हूँ,
न उनमे उभरती मुस्कराहट ही।

उन दिनों
वो सब खो जाने का भय हो गया था
जो खूबसूरत थीं,
या मुझे लगने लगीं थीं,
जैसे सब कुछ।

मैं देख नहीं रहा था दुनिया का मटमैलापन,
नहीं दिख रही थी भुखमरी,
नंगे होते जंगल,
सुखा दी जा रही नदियाँ,
हाशिये पे धकेले जा रहे लोग,
आत्महत्या करते किसान।
मैंने आँखें फेर ली थीं
और अब मुझे सुनाई भी नहीं दे रहा था।
. . . . . . .

लेकिन क्या मेरे भर नहीं देखने से
रंग अपना फूल खो देते ?
मिठास अपनी तितलियाँ ?

या मेरे न देखने से
थम जाती रक्त कि नदियाँ
जो गावों तक बह रही थीं -
नदी का लाल रंग
जो शहरों से निकल रहा था।

1 नवम्बर 2009 (अगस्त में आँख के ऑपरेशन के बाद)

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