बचपन
कैसा
रहा होगा,
कैसा यौवन।
तब हम
कहाँ-कहाँ नहीं गए
वीरान पहाड़ियों पर
घने जंगलों से होकर
या किसी अनजान शहर से
बेख़ौफ़, बेफिक्र
कहाँ-कहाँ नहीं रहे
रात हो या दिन।
अब
हाथ-पाँव
ज़रा सी हवा में भी
काँपने लगते हैं।
बच्चे पल भर नहीं हुए
बाहर गए,
हथेलिओं पर पसीना उभरने लगता है।
आंखें दरवाज़े पर
कील कि तरह गढ़ी रहती हैं
कि अभी आये नहीं।
मैं उम्र को कहूँ
या ज़माने को -
दोनों एक से नहीं रहे.
(२००० से २००८ के दरमयान)
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