कितना फर्क पड़ेगा
अगर मुझे आभास हो जाये,
आभास नहीं,
निश्चित मालूम पड़ जाये
की मुझे अब कितने दिन जीना है -
और ये दिन ज्यादा न हों।
पर ज्यादा कितना होता है?
कभी-कभी,
या अक्सर ही,
एक दिन भी बहुत ज्यादा,
बहुत भारी लगता है;
या कभी-कभी,
शायद कभी ही
सौ दिन भी चुटकी में ही
फिसल जाते हैं।
तो कितना फर्क पड़ेगा?
क्या मैं अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरी करूंगा?
जो पूर्ण होती दिखने के बाद भी
वास्तव में अब तक अपूर्ण रही
बरसों बाद भी।
वाकई क्या फर्क पड़ेगा?
कम जीना होगा
तो क्या मैं बेहतर जीऊंगा ?
तिल-तिल मरूंगा नहीं,
पल-पल गलूँगा नहीं
हर क्षण पूरी तरह जियूँगा।
पर यह मैं पहले ही कैसे कह सकता हूँ?
क्योंकि
जीना औरों से भी होता है।
अगर मुझे आभास हो जाये,
आभास नहीं,
निश्चित मालूम पड़ जाये
की मुझे अब कितने दिन जीना है -
और ये दिन ज्यादा न हों।
पर ज्यादा कितना होता है?
कभी-कभी,
या अक्सर ही,
एक दिन भी बहुत ज्यादा,
बहुत भारी लगता है;
या कभी-कभी,
शायद कभी ही
सौ दिन भी चुटकी में ही
फिसल जाते हैं।
तो कितना फर्क पड़ेगा?
क्या मैं अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरी करूंगा?
जो पूर्ण होती दिखने के बाद भी
वास्तव में अब तक अपूर्ण रही
बरसों बाद भी।
वाकई क्या फर्क पड़ेगा?
कम जीना होगा
तो क्या मैं बेहतर जीऊंगा ?
तिल-तिल मरूंगा नहीं,
पल-पल गलूँगा नहीं
हर क्षण पूरी तरह जियूँगा।
पर यह मैं पहले ही कैसे कह सकता हूँ?
क्योंकि
जीना औरों से भी होता है।