फैज़ अहमद फैज़ की मुहब्बत पर यह नज़्म मेरी पसंदीदा है.
बहार आई
तो जैसे यक बार लौट आये हैं फिर अदम से
वो ख्वाब सारे, शबाब सारे
जो तेरे होंठों पे मर मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिए थे
निखर गए हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं
जो तेरे उश्शाक का लहू हैं
बहार आयी
उबल पड़े हैं अज़ाब सारे
मलाल-ए-इहबाब-ए-दोस्तान भी
खुमार-ए-आग़ोश-ए-मेहवषां भी
गुबार-ए-खातिर के बाब सारे
तेरे हमारे सवाल सारे, जवाब सारे
बहार आयी
तो खुल गए हैं
नए सिरे से हिसाब सारे
नये सिरे से हिसाब सारे
बहार आयी
बहार आयी
***
बहार आई
तो जैसे यक बार लौट आये हैं फिर अदम से
वो ख्वाब सारे, शबाब सारे
जो तेरे होंठों पे मर मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिए थे
निखर गए हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं
जो तेरे उश्शाक का लहू हैं
बहार आयी
उबल पड़े हैं अज़ाब सारे
मलाल-ए-इहबाब-ए-दोस्तान भी
खुमार-ए-आग़ोश-ए-मेहवषां भी
गुबार-ए-खातिर के बाब सारे
तेरे हमारे सवाल सारे, जवाब सारे
बहार आयी
तो खुल गए हैं
नए सिरे से हिसाब सारे
नये सिरे से हिसाब सारे
बहार आयी
बहार आयी
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