Saturday, August 9, 2014

बहार आई

फैज़ अहमद फैज़ की मुहब्बत पर यह नज़्म मेरी पसंदीदा है.

बहार आई
तो जैसे यक बार लौट आये हैं फिर अदम से 
वो ख्वाब सारे, शबाब  सारे
जो तेरे होंठों पे मर मिटे थे
जो मिट के  हर बार फिर जिए थे
निखर गए हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं
जो तेरे उश्शाक का लहू हैं
बहार  आयी  

उबल  पड़े हैं  अज़ाब  सारे
मलाल-ए-इहबाब-ए-दोस्तान भी 
खुमार-ए-आग़ोश-ए-मेहवषां भी
गुबार-ए-खातिर के बाब सारे
तेरे हमारे सवाल सारे, जवाब सारे

बहार आयी
तो खुल गए हैं
नए सिरे से हिसाब सारे
नये सिरे से हिसाब सारे

बहार आयी
बहार आयी


***

कटी ज़ुबान से

मैं सोचता था
और देख भी रहा था
कि वे दूर हैं
और कम संख्या में भी।
पहले तो वे आयेंगे नहीं
और यदि आयेंगे भी
तो मेरे पास पर्याप्त समय होगा
अपनी सुरक्षा के पुख्ता इन्तेजाम करने के  लिए
और दूसरों को चेताने के लिए भी।

पर इधर एकाएक
शायद मैंने झपकी ले ली थी;
मेरे अनुमान से
कहीं अधिक करीब
वे पहुँच गए
और खासी तादाद में भी।

अब तो ज्यादा सम्भावना लग रही है
कि दिन दोपहर ही
किसी गली में
या घर के दरवाज़े पर ही
वे मुझे घेर लेंगे
और अपने लम्बे, नुकीले पंजों से
आवाज़ लगाने के लिए खुल रहे मेरे मुहं से
जुबान खींच कर काट डालेंगे।

(जुलाई २०१४)