कुछ गुजरा मेरे बगल से,
सरसराहट सी हुई,
मैं देख नहीं पाया,
जैसे कोई रूह,
अभी भी गर्म है
जिसका एहसास।
कुछ है ज़रूर
चमकता
बंद आँखों से परे
पर्दों व नकाबों से परे
जो खींचता है
सभी उलझनों के परे।
कुछ है ज़रूर
एक खुशबू
ताज़ा है जिसकी
भीनी महक।
(२००० से २००८ के दरमयान)
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