Monday, June 7, 2010

अंतिम पड़ाव

हँसते
हाँफते
चढ़ते गए हम।

कितना अच्छा था
सोच लेना
कि हम ऊपर जा रहे हैं
और जल्दी ही
पहुँच जायेंगे
उस बिंदु पर
जहाँ कोई
हिला नहीं
पायेगा हमें.

दूर तक
देखेगी
हमारी नज़र
अपनी विजय को फैले हुए
और
आसमान को चूमता,
हवा के पर्दों पर
फहराएगा हमारा नाम.

थकते,
हाँफते
चढ़े जा रहे हैं हम।
अब इतना ही
काफी है
मान लेना
कि हम ऊपर ही जा रहे हैं
और यह चोटी
शायद
आखरी पड़ाव होगा
अंतिम पहाड़ी का.

(१९८० से २००५ के दरमयान)

No comments:

Post a Comment