Tuesday, January 26, 2010

अंधियारे के कुछ दिन

उन्होंने मुझे काला चश्मा दिया
जानते हुए कि
संभाल नहीं पाएंगी मेरी आँखे
यकायक उजाला;
या वे पहचानते थे
आदमी का बेचैन मन
जो क्षण भर भी नहीं रहना चाहता था
अँधा।


उन कम दिनों मे ही
जब मेरे चारों ओर धुंध गहरा गया,
मैं वाकई डर गया था
कि मैं अब देख नहीं पाऊंगा इन्द्रधनुष,
न वे आँखें
जिन्हें देखने के लिए मैं तरसता हूँ,
न उनमे उभरती मुस्कराहट ही।

उन दिनों
वो सब खो जाने का भय हो गया था
जो खूबसूरत थीं,
या मुझे लगने लगीं थीं,
जैसे सब कुछ।

मैं देख नहीं रहा था दुनिया का मटमैलापन,
नहीं दिख रही थी भुखमरी,
नंगे होते जंगल,
सुखा दी जा रही नदियाँ,
हाशिये पे धकेले जा रहे लोग,
आत्महत्या करते किसान।
मैंने आँखें फेर ली थीं
और अब मुझे सुनाई भी नहीं दे रहा था।
. . . . . . .

लेकिन क्या मेरे भर नहीं देखने से
रंग अपना फूल खो देते ?
मिठास अपनी तितलियाँ ?

या मेरे न देखने से
थम जाती रक्त कि नदियाँ
जो गावों तक बह रही थीं -
नदी का लाल रंग
जो शहरों से निकल रहा था।

1 नवम्बर 2009 (अगस्त में आँख के ऑपरेशन के बाद)

Saturday, January 23, 2010

बारिश

पिछली दो रातों और उनके दरमियान ठहरे छुट्टी के
दिन भर
बारिश होती रही।

समुद्र से उठते द्वीपों के ऊपर झुके बादलों कि लटों में
मुझे घर छोढ़े,
भादों का लौट आना सा दिखा,
जब कि वहां इस साल उसकी गुमशदगी कि चिंताएं
दीवारों पे चस्पे इश्तेहारों में दिखती हैं,
हालांकि अभी गहन तहकीकात होना बाकि है,
व उसको मनाने के लिए कुछ इंतज़ाम भी।

बगल किसी दूसरी खिढ़की के ऊपर
टिन पर बूंदों के आवेश से
मैं समझने लगा हूँ कि
बौछार कि दिशा किस ओर होगी।
समुद्र से उठती हवाओं से,
बारिश के परदे पर हवा का बदलता रुख
हर कुछ मिनट
मैं देख पाता हूँ
कि सोलहवीं मंजिल पर अपने इकलौते कमरे में
उसकी फुहार पहुंचेगी कि नहीं
खिढ़की के उस महीन दरार से
जिस तक मैं पहुँच नहीं पाता हूँ।

बस इतना ही कर पाता हूँ कि
छ इंच बाएं या चार इंच दायें सरका लूं
मल्टिपल प्लग, पंखा, दरी व ज़मीन पर बिछा
अपना बिस्तर,
जितनी भर गुंजाइश है।

या फिर,
नहीं ही करता हूँ।
आखिर बारिश भी तो इतनी प्यास के बाद आई है।

-- 26 अगस्त 2009

Friday, January 22, 2010

दोराहा

मैंने अपने को एक दोराहा पर पाया
बदकिस्मती और खुशकिस्मती के बीच।

समझ मे नहीं आया
कि शिकायत करूँ
तो किससे
कि दो रास्ते क्यों;
या धन्यवाद दूं
तो किसे
कि कम से कम दो रास्ते तो हैं
जिनमे से एक खुशियों कि मंजिल तक पहुंचाता है।

मगर मै तय नहीं कर पाया कि कौन सा रास्ता लूं।
दोराहे पर कोई दिशा निर्देश नहीं था,
तिसपर, कोई बगल से गुजरता
चुपके से यह भी कह गया कि
कोई भी रास्ता सीधा नहीं होता।

तो क्या,
मैं ख़ुशी का रास्ता लूँगा
और वो
घूम फिर कर बदकिस्मती में जा मिलेगा?


पर परेशानी इस बात को लेकर नहीं थी
न इस बात को लेकर ही कि
ख़ुशी व बदकिस्मती भी तय नहीं कर पाए कि
उन्हें अपना-अपना रास्ता चुनना है।

मेरी परेशानी थी
मै तय नहीं कर पाया कि पहले किसे चुनुं -
खुशकिस्मती को या बदकिस्मती?
यह भी तो नहीं पता कि
अलग-अलग हिस्सों में
दोनों रास्ते कितने लम्बे हैं,
दूसरे में मिलने से पहले.

और परेशानी यह भी थी कि
अगर ख़ुशी या बदकिस्मती को
अपने-अपने रास्ते नहीं पकढ़ने थे
तो एक ही रास्ते पे क्यों न चल पढ़े,
ताकि मेरे सामने दोराहा तो नहीं होता.

और इसी असम्न्ज्मस व हिचक में
मैं दोराहा पर ठहरा रह गया
ज़िन्दगी भर।

अब मै तय नहीं कर पा रहा हूँ कि
धन्यवाद दूं
कि कोई जोखिम नहीं उठाया,
या पछताऊं
कि कोई जोखिम नहीं उठाया.

Tuesday, January 19, 2010

A beginning - at last

(On starting the blog)

At last.

At last is a point where you "reach". A point when you can say you have "achieved", or "failed".

At last is the end of the road, the top of the mountain, the night. A time to repose.

At last is "the end", when the curtains come down.

But here, at last, I make a beginning.

Is it because there is no end of the road, no top of the mountain, no night?

Or is it because there is always something beyond the end of the road, always something higher than the top of the mountain?

At last - because night is the beginning of a morning, December is the beginning of January.

At last - a time to renew.

A beginning - at last.