Friday, December 4, 2015

कभी-कभी

कितना फर्क पड़ेगा
अगर मुझे आभास हो जाये,
आभास नहीं,
निश्चित मालूम पड़ जाये
की मुझे अब कितने दिन जीना है -
और ये दिन ज्यादा न हों।

पर ज्यादा कितना होता है?

कभी-कभी,
या अक्सर ही,
एक दिन भी बहुत ज्यादा,
बहुत भारी लगता है;
या कभी-कभी,
शायद कभी ही
सौ दिन भी चुटकी में ही
फिसल जाते हैं।

तो कितना फर्क पड़ेगा?

क्या मैं अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरी करूंगा?
जो पूर्ण होती दिखने के बाद भी
वास्तव में अब तक अपूर्ण रही
बरसों बाद भी।

वाकई क्या फर्क पड़ेगा?

कम जीना होगा
तो क्या मैं बेहतर जीऊंगा ?
तिल-तिल मरूंगा नहीं,
पल-पल गलूँगा नहीं
हर क्षण पूरी तरह जियूँगा।

पर यह मैं पहले ही कैसे कह सकता हूँ?
क्योंकि
जीना औरों से भी होता है।


महिला और पलायन

हे परवरदिगार
मेरा हौंसला बना रहे
कि मै बनी रहूँ
अपनी मिट्टी से।
छिटक चांदनी पड़ती रहे
मेरे बेशक दरकते घर पर
जिससे
उग आये झाड़-झंखाड़ के बीच
वो अपना रास्ता ढूंढें
और अपना घर
पहचान सकें।

हे परवरदिगार,
मेरी साँस बनी रहे
आखिरी पठाल के गिरने तक।

* * *
मई २०१५ 

हम बन जाएं पेड़

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मूल ११ मई २०१२ 
आवृति २२ अक्टूबर २०१५] ३ फरवरी २०१७