Friday, August 26, 2011

हम धरती दोहरायेंगे

मंगल पर जब आदमी बसेगा
हम साक्षात देख पायेंगे,
किसी भी संग्रहालय में प्रदर्शित इतिहास-बोध से बेहतर
अपनी धरती की कहानी.

जीवंत प्रकृति की इस उन्मुक्त धरती का आड़ी-तिरछी लकीरों में, 
और उसकी हवा का धर्मो में बँट जाने के, 
हम चश्मदीद गवाह होंगे.
हम देखेगें बीज बोते राष्ट्रवाद और नस्लवाद का,
कि स्वर कैसे बन जाता है शोर,
कैसे बदलते हैं शब्दों के मायने,
कैसे हरी नदियाँ हो जाती हैं लाल.

हम देखेगें
हम देखेगें
क्या क्या नहीं देखेगें.
पर क्या,
हम समझेगें ?

Sunday, August 7, 2011

बरसात

ये कैसे हुआ
की उम्मीद का मौसम
त्रासदी में तब्दील हुआ
और त्रासदी का ही बन के रह गया.

इंतज़ार के बस आखिरी ही महीने
मन उतावला होने लगता था
पर शायद बेसब्र नहीं;
ठीक जैसे
तुम्हारे इंतज़ार में गुज़रते थे मेरे दिन
जिनमे प्यास तो होती थी ही, 
पर अविचल विश्वास भी
की तुम आओगी ज़रूर;
और मै सभी कुछ तरतीब से तैयार कर रखता था
तुम्हारे स्वागत में - खेत, हल, बीज.

पर अब दो दिन की देरी मे ही
विश्वास घटने लगता है महज उम्मीद में
और दरवाज़े पर दस्तक देती हैं चिंता, शक, निराशा.
आसमान तकते हुए माथे पर उभरती शिकन 
धूप से पिघल
ज़मीन पर उतरने लगती है। 

मैं अब भी
सभी कुछ करीने से तैयार कर रखता हूँ
तुम्हारे स्वागत में;
पर पूछो तो
न स्पष्ट, न पूरे विश्वास के साथ कह पाता हूँ
की तुम आओगी भी की नहीं,
और आओगी भी तो किस वेष में,
किस मनस्तिथि में,
किस वेग से
और कितने दिन ठहरोगी.
और न ही मैं तुमसे पूछने का
साहस कर पाता हूँ। 

पहले भी तुम्हारा समय सीमित ही होता था
मेरे साथ
पर उतना भी काफी था मेरे लिए;
क्योंकि वो निश्चित था और
साथ गुज़रे पलों की गर्माहट
साल भर बनी रहती
खुशबू की तरह
मेरे खेत और खलिहान में,
घर और आँगन में। 
मुझे मालूम रहता था
तुम न होते हुए भी बनी रहोगी
जंगल की हरियाली और
मिटटी की नमी में,
खिलते फसलों की चमक में
पकते बीजों और अन्न के स्वाद में। 

पर मुझसे ही खता हुई
कि कहाँ हमारे सम्बन्ध टूट कर बिखर गए -
शायद जाने-अनजाने,
किसी सपने के पीछे भागते हुए,
किसी लालच या षड़यंत्र का शिकार,
मैने जंगल काट डाले
यह सोच कर कि तुम्हारा आना सुगम होगा
पर नहीं जाना की वे 
तुम्हे रोक भी तो लेते थे जाने से,  कुछ दिन।

बगैर तुमसे पूछे
बगैर तुम्हारा सोचे
मैने सड़कों का जाल बिछा डाला 
पर अंत: तुम्हारे ही सब रास्ते बंद कर डाले। 

मैने और क्या क्या किया
कि
इंतज़ार के पल 
अब भय के साथ आने लगे हैं  
और उम्मीद का मौसम
त्रासदी का बन के रह गया है। 

***
७ अगस्त २०११ 

Wednesday, August 3, 2011

बालिका भ्रूण हत्या पर

क्या होगा,
चालीस साल बाद क्या होगा?

अगर धरती थम जाये अपनी धुरी पर
न हो रात, न दिन, न बसंत, न शिशिर -
तब क्या होगा?

अगर सूरज उगना छोढ़ दे
न हो पूर्णिमा, न अमावस, न चमकें रात में तारे - 
तब क्या होगा?

अगर आसमान न रहे नीला
न उठे कहीं बादल, न बरसे कहीं पानी - 
तब क्या होगा?

अगर हवा रुक जाये बहना
न उठे चिढ़ियों का स्वर, न उढ़े तितलियाँ -
तब क्या होगा?

अगर मिटटी हो जाये बाँझ
न उठे सोंधी खुशबू, न उगे हरी घास -
तब क्या होगा?

अगर पहाढ़ हो जायें नंगे 
न बहे नदियाँ, न रहे घाटियाँ हरी-भरी -
तब क्या होगा?

अगर मेरी हों सिर्फ एक आँख
एक कान, एक नासिका, एक हाथ, एक टांग -
तब क्या होगा?

अगर लुप्त हो जायें शब्दकोष से 
माँ, बहिन, सखी, प्रेमिका, पत्नी, बेटी, पोती -
तब क्या होगा?

अगर न हो सृजन 
तो क्या होगा?

क्या होगा, हे अर्धनारीश्वर!

***
(महिला दिवस पर, कुछ साल हुए)

झील

वे आंखें हैं
की कोई खाई - 
गहरी,
काली,
तला नहीं दीखता था 
जिनका.

मैं घबराया
की झाँकूंगा 
तो गिर ही पडूंगा 
और नामो-निशान भी नहीं रहेगा.

पर भय भी रोक नहीं पाया
सम्मोहन
और मैं करीब आया,
तो पाया
की खाई नहीं,
झील हैं
वे आंखें -
गहरी,
काली.
झलक रहा था
जिनमे
एक पूरा आसमान.

फिर उतरा मैं उनमे
धीरे से;
न घबराहट
अब न भय.

उतरा मैं धीरे से
झील सी उन आँखों में
और उतरता गया,
उतरता गया,
बस
उतरता ही गया.

***

एक दर्द सा उठा

एक दर्द सा उठा 
सीने मैं.

मैने हथेली से सहलाया
कि जान सकूँ 
कहाँ से शुरू हुआ वह -
- किसी से आहत होकर
या 
किसी की चाहत में?

***

सूखा

बेरहम आसमान -
ठहरता नहीं कहीं 
बादल का एक कतरा 
तरस गयी हैं 
आँखें
देखनें के लिए
जैसे किसी को.

बेरहम आसमान -
होती नहीं कहीं 
बादलों की गढ़गढ़ाहट;
तरस गए हैं 
कान
सुनने के लिए 
जैसे किसी की आवाज़.

बेरहम आसमान -
उठती नहीं कहीं
पहली बूंदों से सोंधी महक;
तरस गया है
एहसास
जैसे किसी खुशबू के लिए.

बेरहम आसमान -
बहती नहीं कहीं
गीली हवा;
तरस गया है
मन
जैसे एक छुअन के लिए.

***

कर्फ्यू

जब दरवाज़े भेढ़ दिए जाते हैं 
और आप भीतर बंद;
मनाही होती है 
कहीं निकलने की,
किसी से मिलने की,
बतियाने की,
छूने की.

यह कर्फ्यू है.

पर यह कर्फ्यू है तन का
मन का नहीं.

मन के लिए कोई दरवाज़ा बंद नहीं,
कोई दीवार ऊंची नहीं,
कोई फासला दूर नहीं.
निकल पड़ता है वह 
पहली अजान के साथ
और देर तक लौटता है.

कभी तो वह भी नहीं
कई दिन.

घूमता है वह उन गलियों मे
जो तुम्हारी हैं,
जहाँ मनाही है.

रहता है वह
जहाँ चाहता है रहना 
जिसके साथ, 
आठों पहर.

***