की उम्मीद का मौसम
त्रासदी में तब्दील हुआ
और त्रासदी का ही बन के रह गया.
इंतज़ार के बस आखिरी ही महीने
मन उतावला होने लगता था
पर शायद बेसब्र नहीं;
ठीक जैसे
तुम्हारे इंतज़ार में गुज़रते थे मेरे दिन
जिनमे प्यास तो होती थी ही,
पर अविचल विश्वास भी
की तुम आओगी ज़रूर;
और मै सभी कुछ तरतीब से तैयार कर रखता था
तुम्हारे स्वागत में - खेत, हल, बीज.
पर अब दो दिन की देरी मे ही
विश्वास घटने लगता है महज उम्मीद में
और दरवाज़े पर दस्तक देती हैं चिंता, शक, निराशा.
आसमान तकते हुए माथे पर उभरती शिकन
धूप से पिघल
ज़मीन पर उतरने लगती है।
मैं अब भी
सभी कुछ करीने से तैयार कर रखता हूँ
तुम्हारे स्वागत में;
पर पूछो तो
न स्पष्ट, न पूरे विश्वास के साथ कह पाता हूँ
की तुम आओगी भी की नहीं,
और आओगी भी तो किस वेष में,
किस मनस्तिथि में,
किस वेग से
और कितने दिन ठहरोगी.
और न ही मैं तुमसे पूछने का
साहस कर पाता हूँ।
पहले भी तुम्हारा समय सीमित ही होता था
मेरे साथ
पर उतना भी काफी था मेरे लिए;
क्योंकि वो निश्चित था और
साथ गुज़रे पलों की गर्माहट
साल भर बनी रहती
खुशबू की तरह
मेरे खेत और खलिहान में,
घर और आँगन में।
मुझे मालूम रहता था
तुम न होते हुए भी बनी रहोगी
जंगल की हरियाली और
मिटटी की नमी में,
खिलते फसलों की चमक में
पकते बीजों और अन्न के स्वाद में।
पर मुझसे ही खता हुई
कि कहाँ हमारे सम्बन्ध टूट कर बिखर गए -
शायद जाने-अनजाने,
किसी सपने के पीछे भागते हुए,
किसी लालच या षड़यंत्र का शिकार,
मैने जंगल काट डाले
यह सोच कर कि तुम्हारा आना सुगम होगा
पर नहीं जाना की वे
तुम्हे रोक भी तो लेते थे जाने से, कुछ दिन।
बगैर तुमसे पूछे
बगैर तुम्हारा सोचे
मैने सड़कों का जाल बिछा डाला
पर अंत: तुम्हारे ही सब रास्ते बंद कर डाले।
मैने और क्या क्या किया
कि
इंतज़ार के पल
अब भय के साथ आने लगे हैं
और उम्मीद का मौसम
त्रासदी का बन के रह गया है।
***
७ अगस्त २०११