मैंने जीना चाहा
और खिड़की खोल दी।
बस,
इतना भर आकाश था।
घास का तिनका संभाले
सुबह एक
चिड़िया झांकने लगी
कहीं नींव के लिए;
पर मैं
जो खुद ठौर ढूँढ रहा,
वह मुझसे क्या पाएगी?
उसने कहा
तुम आकाश ढूँढ रहे हो,
मैं ज़मीन।
आओ
दोनों
थोड़ा
एक-दूसरे से ले लें।
(१९८० से २००५ के दरमयान)
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