Monday, June 7, 2010

मैंने जीना चाहा

मैंने जीना चाहा
और खिड़की खोल दी।
बस,
इतना भर आकाश था।

घास का तिनका संभाले
सुबह एक
चिड़िया झांकने लगी
कहीं नींव के लिए;
पर मैं
जो खुद ठौर ढूँढ रहा,
वह मुझसे क्या पाएगी?

उसने कहा
तुम आकाश ढूँढ रहे हो,
मैं ज़मीन।
आओ
दोनों
थोड़ा
एक-दूसरे से ले लें।

(१९८० से २००५ के दरमयान)

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