वो सामने बैठी औरत
वह नहीं
तुम थीं
और यह उपन्यास कैसा
जिसका
हर शब्द
तुम्हारा नाम है.
ब्रेक फेल हो गए हैं
मन के -
बस व्याख्या कर दी.
हर शाम
परेशानी का थमना
शहर की
आवारा सड़कों पर
अपना एक द्वीप खोजना
और
पा लेना
भी तो अभ्यास हो आया था.
पर हंसी
किस गली मुड़ी
कि गुम ही गयी.
(१९८२-१९८४ के दरम्यान)
वह नहीं
तुम थीं
और यह उपन्यास कैसा
जिसका
हर शब्द
तुम्हारा नाम है.
ब्रेक फेल हो गए हैं
मन के -
बस व्याख्या कर दी.
हर शाम
परेशानी का थमना
शहर की
आवारा सड़कों पर
अपना एक द्वीप खोजना
और
पा लेना
भी तो अभ्यास हो आया था.
पर हंसी
किस गली मुड़ी
कि गुम ही गयी.
(१९८२-१९८४ के दरम्यान)
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