Wednesday, August 3, 2011

झील

वे आंखें हैं
की कोई खाई - 
गहरी,
काली,
तला नहीं दीखता था 
जिनका.

मैं घबराया
की झाँकूंगा 
तो गिर ही पडूंगा 
और नामो-निशान भी नहीं रहेगा.

पर भय भी रोक नहीं पाया
सम्मोहन
और मैं करीब आया,
तो पाया
की खाई नहीं,
झील हैं
वे आंखें -
गहरी,
काली.
झलक रहा था
जिनमे
एक पूरा आसमान.

फिर उतरा मैं उनमे
धीरे से;
न घबराहट
अब न भय.

उतरा मैं धीरे से
झील सी उन आँखों में
और उतरता गया,
उतरता गया,
बस
उतरता ही गया.

***

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