Friday, December 4, 2015

महिला और पलायन

हे परवरदिगार
मेरा हौंसला बना रहे
कि मै बनी रहूँ
अपनी मिट्टी से।
छिटक चांदनी पड़ती रहे
मेरे बेशक दरकते घर पर
जिससे
उग आये झाड़-झंखाड़ के बीच
वो अपना रास्ता ढूंढें
और अपना घर
पहचान सकें।

हे परवरदिगार,
मेरी साँस बनी रहे
आखिरी पठाल के गिरने तक।

* * *
मई २०१५ 

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