हे परवरदिगार
मेरा हौंसला बना रहे
कि मै बनी रहूँ
अपनी मिट्टी से।
छिटक चांदनी पड़ती रहे
मेरे बेशक दरकते घर पर
जिससे
उग आये झाड़-झंखाड़ के बीच
वो अपना रास्ता ढूंढें
और अपना घर
पहचान सकें।
हे परवरदिगार,
मेरी साँस बनी रहे
आखिरी पठाल के गिरने तक।
* * *
मई २०१५
मेरा हौंसला बना रहे
कि मै बनी रहूँ
अपनी मिट्टी से।
छिटक चांदनी पड़ती रहे
मेरे बेशक दरकते घर पर
जिससे
उग आये झाड़-झंखाड़ के बीच
वो अपना रास्ता ढूंढें
और अपना घर
पहचान सकें।
हे परवरदिगार,
मेरी साँस बनी रहे
आखिरी पठाल के गिरने तक।
* * *
मई २०१५
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