Tuesday, November 15, 2016

मेरे शरीर का तुम क्या करोगे?

मैं  जब मरूंगा 
तो मेरे शरीर का तुम क्या करोगे?
वैसे, 
दफ़नाओगे तो अच्छा रहेगा । 
मैं ताज़िन्दगी 
ज़मीन से जुड़ा रहा 
अब मर का उसका साथ छोड़ना 
ठीक नहीं रहेगा। 

मगर तुम 
मेरे शरीर को दफ़्नाओगे नहीं;
अग्नि को दोगे। 

तुम मेरा शरीर 
अग्नि को दोगे 
तो उसकी राख का क्या करोगे ?
अगर गंगा में बहाने की सोचोगे 
तो मत करना। 
बेहतर होगा 
उस राख को घर ले जा कर 
बर्तन धोने के काम में लाना। 
हो सकता है 
चमकते बर्तनों में 
दो-एक दिन और 
तुम मेरा अक्स देख सको। 

और हाँ!
ध्यान रखना 
कि जिन लकड़ियों से 
तुम चिता सजाओगे 
वे उन ही पेड़ों की हों 
जो मैंने अपनी ज़िन्दगी में  लगाए। 
मेरे कर्म 
मेरे भी काम आ सकें 
वह भी सही होगा। 

नहीं तो 
वे लकड़ियां उन पेड़ों की हों 
जो किसी मज़ार पर लगे, उगे हों। 
कम से कम 
मृत्यू के बाद ही सही 
हम 
एक-दूसरे के काम तो आएं। 

और अगर फिर भी ऐसा पेड़ न मिले, 
तो मेरी स्मृति में
एक पेड़ ज़रूर लगा देना  
जो किसी आने वाली पीढ़ी  के 
शव के
 दाह  संस्कार के काम आ सकें।

* * *
१३ अक्टूबर २०१६ 

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