मै उसे छोड़ आया था
यह सोच कर कि
और राख भी
ठंडी पड़ चुकी है,
यह भूलते हुए कि
दफ़न सुप्त अंगारों की
नब्ज़
जल्दी शिथिल पड़ती नहीं।
खून उनका लाल
और गर्म रहता है
अरसे तक।
धधकना उनकी स्मृति से
विलुप्त होता नहीं
आसानी से।
राख ही उन्हें
देता है वो कवच।
बस,
बंद खिड़की
के खुलने की देर थी
और हवा का
एक झोंका आने की।
* * *
७ अगस्त २०१५
यह सोच कर कि
अब तो
सब राख हो गया है और राख भी
ठंडी पड़ चुकी है,
यह भूलते हुए कि
दफ़न सुप्त अंगारों की
नब्ज़
जल्दी शिथिल पड़ती नहीं।
खून उनका लाल
और गर्म रहता है
अरसे तक।
धधकना उनकी स्मृति से
विलुप्त होता नहीं
आसानी से।
राख ही उन्हें
देता है वो कवच।
बस,
बंद खिड़की
के खुलने की देर थी
और हवा का
एक झोंका आने की।
* * *
७ अगस्त २०१५
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