Friday, August 7, 2015

राख और अंगार

मै उसे छोड़ आया था 
यह सोच कर कि 
अब तो 
सब राख हो गया है 
और राख भी 
ठंडी पड़ चुकी है,
यह भूलते हुए कि 
दफ़न सुप्त अंगारों की 
नब्ज़ 
जल्दी शिथिल पड़ती नहीं। 
खून उनका लाल 
और गर्म रहता है 
अरसे तक।
धधकना उनकी स्मृति से 
विलुप्त होता नहीं
आसानी से।
राख ही उन्हें
देता है वो कवच।

बस,
बंद खिड़की
के खुलने की देर थी
और हवा का
एक झोंका आने की।

* * *
७ अगस्त २०१५ 







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