Saturday, August 9, 2014

कटी ज़ुबान से

मैं सोचता था
और देख भी रहा था
कि वे दूर हैं
और कम संख्या में भी।
पहले तो वे आयेंगे नहीं
और यदि आयेंगे भी
तो मेरे पास पर्याप्त समय होगा
अपनी सुरक्षा के पुख्ता इन्तेजाम करने के  लिए
और दूसरों को चेताने के लिए भी।

पर इधर एकाएक
शायद मैंने झपकी ले ली थी;
मेरे अनुमान से
कहीं अधिक करीब
वे पहुँच गए
और खासी तादाद में भी।

अब तो ज्यादा सम्भावना लग रही है
कि दिन दोपहर ही
किसी गली में
या घर के दरवाज़े पर ही
वे मुझे घेर लेंगे
और अपने लम्बे, नुकीले पंजों से
आवाज़ लगाने के लिए खुल रहे मेरे मुहं से
जुबान खींच कर काट डालेंगे।

(जुलाई २०१४)
  

No comments:

Post a Comment