Monday, July 18, 2011

Tujhe Khojney Jangal Nahi Jaaonga

तुझे खोजने जंगल नहीं जाऊँगा
रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति 

मैं तेरे लिए सुबह बन के वापस आऊँगा
मैं बनता रहूँगा तेरे लिए धरती के मौसम

मैं बनूँगा तेरे लिए दोपहर और शाम
मैं खोजता रहूँगा तुझे धूप की किरणों में 
मैं जानता हूँ तू यहीं-कहीं है इस धरती में
तू मेरे शहर की हवा में घुली हुई 
मेरे शहर की चहल-पहल में मिली हुई 

मैं सब में तुझे तलाश करूंगा
तेरा न मिलना मेरे दुःख का कारण नहीं
तेरा न मिलना जीवन का सफ़र है

मैं जानता हूँ तू यहीं-कहीं मिल जायेगी
शहर में मेरे काम के दौरान आते जाते

मैं तुझे खोजने जंगल नहीं जाऊँगा
मंदिरों और ध्यान केन्द्रों पर भी नहीं
हिल स्टेशनों और बीच पर नहीं जाऊँगा

मैं तुझे खोजते-खोजते सब बन जाऊँगा
और आखिर मै खुद में ही खोजूंगा तुझे

कितना सुन्दर होगा उस दिन का मौसम
जब सब मुझ में होगा और तू सब में होगी.

***
www .raviwar .com से साभार; १९ जुलाई २०११ 

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